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    Bihar News : बिहार के इस गांव में आज भी लोग जड़ी-बूटी खाकर भूख मिटाते हैं, एक भी घरों में खटिया-चौकी नहीं

    आशीष कुमार 2025-02-15 13:08:39 राज्य

      गया न्यूज : बिहार के गया में गुरपा जंगल है. इस जंगल की तलहटी में पहाड़ के नीचे आदिवासी जनजाति बिरहोर समुदाय के लोग निवास करते हैं. तकरीबन ढाई सौ से अधिक की आबादी बिरहोर आदिवासियों की है. गुरपा में इन आदिवासियों की सूरत आज भी नहीं बदली है. बुनियादी सुविधाओं से महरूम बिरहोर आदिवासी आज लाचार, बेबस, भूखमरी के कगार पर अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार जैसी बुनियादी सुविधाएं इन से कोसों दूर है. दुर्भाग्य है कि इन बेबस बिरहोर आदिवासियों के लिए सरकार के द्वारा दिए जाने वाले अनाज भी डकार लिए जाते हैं.

      विलुप्त होती जनजाति में से एक बिरहोर आदिवासियों का समुदाय 

      गया जिले के सुदरवर्ती फतेहपुर प्रखंड अंतर्गत गुरपा में पहाड़ी की तलहटी के नीचे बिरहोर आदिवासी निवास करते हैं. तकरीबन ढाई सौ से अधिक इन बिरहोर आदिवासियों की संख्या है. आज भी यहां रहने वाले बिरहोर आदिवासियों का व्यवहार पुराने युग के आदिवासियों का एहसास करा देता है. दूसरे लोगों को देखकर उनमें एक डर जैसा पैदा हो जाता है और भी बात करना पसंद नहीं करते. हालांकि कुछ लोग अब धीरे-धीरे खुलना शुरू हुए हैं, लेकिन आज भी ज्यादातर आबादी किसी से बात करने से दूर रहना ही पसंद करती है. खासकर महिलाएं नए अनजान व्यक्ति को देखकर दूर होने का प्रयास करती है आदिवासियों की विलुप्त होती जनजाति में से एक बिरहोर आदिवासियों का समुदाय है. 

      बिरहोर आदिवासी काफी कम संख्या में रह गए हैं. ऐसे अब गिने-चुने ही स्थान होंगे, जहां इन बिरहोर की आबादी होगी. इसी में एक गया का गुरपा है, जहां बिरहोरों की अच्छी खासी आबादी है. पुराने व्यवहार के अनुसार आज भी कुछ बिरहोर ऐसे हैं, जो पेड़ों पर चढ़े रहते हैं और अपनी भाषा में आवाज निकालते हैं. पेड़ों की टहनियों को झुकाने और हिलाते हुए बोलते भी नजर आ जाते हैं. उनकी आदिवासी भाषा को समझना काफी मुश्किल है. हालांकि अब काफी संख्या में बिरहोर आदिवासियों ने पूरी तरह से हिंदी समझना और बोलना शुरू कर दिया है।  


      इन बिरहोर आदिवासियों के घरों में किवाड़ लगे नहीं मिलेंगे. एक खटिया भी इनसे कोसों दूर है. पूरा बिरहोर आदिवासी जमीन में ही सोता है. निश्चित तौर पर आज के दौर में यह स्थिति प्रशासनिक संवेदनहीनता की प्रकाष्ठा बताती है. यहां पुराने इंदिरा आवास कुछ संख्या में हैं, जो कि अब जीर्ण शीर्ण हालत में आ गए हैं. इसके कारण आदिवासियों ने ताड़ के पत्तों से घर बनाया है. सूअर के बखोर जैसा बनाए घर में भी अधिकांश आबादी अपनी रात गुजारते हैं. हालांकि कुछ को आवास योजना का लाभ हाल में दिया गया है, किंतु ये बताते हैं, कि उन्हें पैसे नहीं दिए गए, जिसके कारण पूरा निर्माण नहीं हो सका। 

      भूख मिटाने के लिए ये जड़ी बूटी खाते 

      सरकार आदिवासियों के संरक्षण और उत्थान के लाख दावे कर ले, लेकिन गुरपा के बिरहोर आदिवासियों की स्थिति बताती है, कि कहीं ना कहीं प्रशासनिक संवेदनहीनता है. वही, बिचौलिए इन गरीब असहायों कि हकमारी कर रहे हैं. इन्हें जो हक मिलना चाहिए, वह उनके घरों तक नहीं पहुंच पाता. बीच में ही डकार लिया जाता है. यही वजह है, कि इन बिरहोर आदिवासियों का समुचित विकास आज के दौर में भी नहीं हो पा रहा है. जबकि सरकार आदिवासी जनजाति, अंतिम पायदान के लोगों के लिए के लिए तरह-तरह के दावे करती है, परंतु दावे यहां पूरी तरह से विफल नजर आते हैं बिरहोर आदिवासियों के अनुसार उन्हें दो शाम का भोजन नसीब नहीं हो पाता है. 

      यदि कमाई अच्छी नहीं हुई, तो भूखे भी रहना पड़ता है. भूख मिटाने के लिए ये जड़ी बूटी खाते हैं. जड़ी बूटी के रूप में टेना गेठी का उपयोग करते हैं, जो शकरकंद की तरह मीठा होता है. कई दिनों तक उनकी भूख से लड़ाई जो चलती है, उसे टेना गेठी ही शांत करती है. बरसात के दिनों में उनकी स्थिति बद से बदतर हो जाती है. बिरहोर आदिवासी मेहनती होते हैं. ये भीख मांगना पसंद नहीं करते. किंतु उनकी ताकत और साहस आज भिक्षावृति के रूप में तब्दील हो गए हैं. कई बिरहोर आदिवासी ऐसे हैं, जो दूसरों के घरों से जाकर भीख मांगते हैं और तब जाकर उनके घर का गुजारा बमुश्किल हो पाता है. कुल मिलाकर इनके 2 शाम की रोटी का भोजन का जुगाड़ हो पाना काफी मुश्किल है. 

      यहां के बिरहोर आदिवासी बताते हैं, कि उन्हें रोटियां खाए कई दिन हो जाते हैं. यहां के किसी लोगों के बैंक अकाउंट तक नहीं है गुरपा में रह रहे इन आदिवासियों को बीमारियों ने तोड़ दिया है. विभिन्न तरह की बीमारियों से बिरहोर आदिवासी ग्रसित है. वहीं बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं. यहां एक प्राथमिक विद्यालय खुला है, किंतु यहां शिक्षा की बात करें, तो अब तक कोई भी शिक्षित नहीं है. यहां के लोग बताते हैं, कि यहां कोई भी पढ़ा लिखा नहीं है. यह जो स्कूल खुला है, उसमें भी दूसरे टोले के बच्चे ज्यादा संख्या में आकर पढ़ते हैं. इक्के-दुक्के आदिवासी के बच्चे पढ़ने को जाते हैं. 

      बिरहोर आदिवासियों में से कई को राशन कार्ड नहीं

      आज भी बिरहोर आदिवासियों में से कई को राशन कार्ड नहीं है. आवास योजना का लाभ नहीं दिया गया है, तो कई के पास वोटर कार्ड और आधार कार्ड भी नहीं है गुरपा में रहने वाले ये आदिवासी बताते हैं, कि जंगल में जड़ी बूटी चुनकर लाते हैं. उसे झारखंड के कोडरमा में बेजते हैं. जड़ी बूटी नहीं बिकी, तो भोजन का जुगाड़ नहीं हो पाता है. उनके पास कोई रोजगार नहीं है. जड़ी बूटी कोडरमा में नहीं बिकी तो भोजन का जुगाड़ कर पाना का भी मुश्किल होता है. ऐसी स्थिति में हम लोग जड़ी बूटी खाकर भूख को शांत करते हैं. जड़ी बूटी के रूप में टेना गेठी ठीक होती है, उसे ही हम लोग भोजन के रूप में उपयोग करते हैं. महीने में कई दिन भूखे रह जाना पड़ता है. 

      बरसात में स्थिति और भी मुश्किल वाली हो जाती है. बरसात के कारण घर के बाहर बनाए गए चूल्हे भीग जाते हैं, वहीं लड़कियां भी नहीं मिलती है. ऐसे में टेना गेठी को उबालकर खाना मुश्किल हो जाता है. भूखे रहने की नौबत होती है. कारु बिरहोर बताते हैं, कि हम आदिवासियों के किसी घर में किवाड़ नहीं मिलेगी. खाटी चौकी भी नहीं है. सालों भर जमीन पर सोते हैं कारू बिरहोर, गुरपा वही बिरहोर आदिवासी महिला इतवारिया बताती है कि हम लोग टेना गेठी ही खाते हैं. कई दिनों तक खाते हैं और भूख को शांत करते हैं. यहां कई बीमार हैं, लेकिन कोई देखने वाला नहीं है. लोग आते हैं और चले जाते हैं, हमें लाभ नहीं देते हैं. वही शामू बिरहोर बताती है, कि उसे राशन कार्ड नहीं मिला है. खाए बिना कमजोर हो गई है. वह बीमार रहती है. जब शरीर में कुछ ताकत रहती है, तो दूसरे के घर में काम करते हैं और तब जाकर किसी तरह से भोजन नसीब हो पाता है. 


      सरकार की योजना का लाभ हमें नहीं मिलता है, जबकि हम लोग में से कई लोग वोट भी देते हैं. बगधु बिरहोर बताते हैं, कि वह झोपड़ी में रहता है. उसे आवास नहीं मिला है. ताङ का झोपड़ी बनाकर रहते हैं. राशन कार्ड से केवल चावल मिलता है. गेहूं नहीं मिलता. कई दिनों तक रोटी खाए हो जाता है. भोजन में चावल और टेना गेठी ही मिल पाता है. वही, मीना बिरहोर बताती है, कि जड़ी बूटी चुनकर हम लोग भोजन का जुगाड़ करते हैं. झोपड़ी में रहते हैं, क्योंकि आवास जो था, वह जर्जर हो गया है. काफी पहले हम लोगों का आवास मिला था. राशन में गेहूं नहीं मिलता है, जिसके कारण रोटी हम लोगों को नसीब जल्दी नहीं हो पाता है. सिर्फ चावल ही राशन में मिल पाता है. यहां कोई भी पढ़ा लिखा नहीं है. हम लोग मांग करते हैं कि हम लोगों को हमारा हक सरकार प्रशासन के लोग दें.

      बिरहोर आदिवासी विलुप्ति के कगार पर 

      जातक संस्था बिरहोर आदिवासियों के लिए विशेष काम कर रही है वहीं, जातक संस्था के द्वारा बिरहोर आदिवासियों के बीच जाकर कई तरह के कार्य किया जा रहे हैं. हेल्थ कैम्प भी लगाया जाता है. बिरहोर आदिवासी विलुप्ति के कगार पर हैं. इन आदिवासियों को सरकार द्वारा संरक्षित किया जाना चाहिए. वहीं, सरकार और प्रशासन के लोग इन्हें हर सुविधा दें, ताकि इनका भी विकास हो सके. आदित्य वर्धन, जातक संस्था के निदेशक गुरपा में बिरहोर आदिवासी का निवास है. यहां क्या योजनाएं चल रही है और क्या लाभ यहां के लोगों को मिला है. वह उन्हें पूरी तरह से ज्ञात नहीं है, क्योंकि वह मुख्य रूप से टनकुप्पा प्रखंड की बीडीओ है. 

      अभी अतिरिक्त प्रहार में फतेहपुर प्रखंड दिया गया है. इस तरह का मामला संज्ञान में आया है, तो वह गुरपा का निरीक्षण करेंगी और बिरहोर आदिवासियों को जो लाभ मिलने चाहिए, वह मिल रहे हैं या नहीं, इसका जायजा लेकर आवश्यक कार्रवाई होगी. फिलहाल इस संबंध में वह विशेष रूप से ज्यादा नहीं बता सकती हैं, क्योंकि उन्हें गुरपा के बिरहोर आदिवासियों के संबंध में विशेष जानकारी नहीं है. अभी अतिरिक्त प्रभार 15 दिन पहले मिला है, तो इस मामले को वह देखेंगी.

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